हाथोंधा महल विरासत का इतिहास हाथोंधा किला सूरजपुर बहरेला बाराबंकी उत्तर प्रदेश अवध बहरेलिया राजपूत


हथोंधा_विरासत_का_इतिहास राजा महिपाल सिंह,राजा पृथ्वीपाल सिंह

                  बहरेलिया राजपूत सिसोदिया वंश

अवध की एतिहासिक रियासतो मे शुमार सूरजपुर बहरेला स्टेट बाराबंकी की विरासत का बेशुमार नाम है।।


सिंह जी के बाद सारी रियासत राजा सिंहजी की पत्नी के पास आ गयी। लेकिन रियासत का एक हिस्सा गवर्नर जनरल के सिपाही के पास चला गया था जो आज भी उनके परिवार के पास है 

रानी लेखराज कुंवर, जो ऊर्जा और संसाधन की एक उत्कृष्ट महिला थीं, उन्होने सनद हासिल किया। जिसने राम सनेही घाट तहसील के इस तालुका के मुख्यालय के रूप में कामियरगंज सुमेरगंज का निर्माण किया था। जैसा की indian Gazetteer 1964 मे उल्लेख किया गया था,

इमारतें और बाज़ार उनके द्वारा बनाए गए थे और यह इलाका उनकी जागीर में था

राजमाता ने सूरजपुर छोड़कर राम सनेही घाट को अपना मुख्यालय बनाया।

उनकी मृत्यु के समय, संपत्ति राजा उदित प्रताप सिंह के हाथों में चली गई, जो अपने नाना, उदित नारायण द्वारा नियंत्रित संपत्ति का प्रबंधन करने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से अयोग्य थे। लेकिन उनकी एक बेटी कुंवारी रघुवारी ही थी। उन्होने अपनी बेटी को  देना सोचा तो राजा सिंह जी के दत्तक पुत्र एवं राजा सिंह जी के छोटे भाई ईश्वरी सिंह के पुत्र राजा महिपाल सिंह ने ब्रिटिश दरबार के सामने मामला रखा कि भारत में हमारे पास ऐसी व्यवस्था नहीं है जहाँ लड़कियों को राज्य दिया जा सके। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से अनुरोध किया कि वह महाराज सिंहजी के चचेरे भाई रिश्तेदार होने के नाते राज्य को अनुदान दें। सिंहजी महाराज के अधिक करीबी थे लेकिन बाराबंकी में नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि राजा उदित प्रताप की बेटी को राज्य दे दिया गया तो बहरेलिया सिसोदिया वंश नष्ट हो जाएगा। इस तरह इस वंश के हाथोंडा परिवार में राज आ गया, ओर हाथोंधा के राजा महिपाल सिंह हुए

राजा महिपाल सिंह बहरेलिया ने बहुत अच्छे काम किए।

राजा महिपाल सिंह बहरेलिया जी का चित्र

1870 मै महाराज महिपाल सिंह बहरेलिया जी की मृत्यु हो गयी ओर उनके इकलौते पुत्र राजा पृथ्वीपाल सिंह बहरेलिया ने वहा का राजपाठ सम्भाल लिया। फिर 1909 मे इस चंद्रहास राजमहल का निर्माण किया। राजा पृथ्वीपाल सिंह बहरेलिया शिक्षा प्रेमी थे,और शिक्षा के महत्त्व को जानते थे इसलिए उन्होंने अपने राज्य में अनिवार्य शिक्षा कानून लगा रखा था, और हर आदमी को जबरिया तालीम दी जाती थी ,राजा पृथ्वीपाल सिंह बहरेलिया जी के जमाने के बने तमाम प्राथमिक विद्यालय के भवन आज भी क्षेत्र में जीण शीण दशा में मौजूद है राजा पृथ्वीपाल सिंह जी  शिक्षा प्रेमी होने की बात को सभी जानते थे पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने ब्रिटिश शासन के दौरान 19 वीं सदी की शुरुआत में हिन्दू धर्म संस्कृति के विस्तार एवं पुनर्स्थापना के बनारस में हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना करने का बीड़ा उठाया था।उन्होंने इस कार्य में सरकार के साथ साथ  राजा महराजाओं से भी चंदा लेकर उन्हे भी सहभागी बनाया था 

साथ ही बाराबंकी जिले के सूरजपुर स्टेट के हाथोंधा स्थित राजमहल  चन्द्रहास भवन राजा पृथ्वीपाल सिंह जी से भी चंदा माँगने आये थे क्योंकि उन्होंने सुन रखा था कि यहाँ के राजा दानवीर के साथ ही शिक्षाप्रेमी हैं और अपनी राज्य में अनिवार्य शिक्षा व्यवस्था लागू कर रखी है।पंडित महामना मदन मोहन मालवीय इसी नाते जब बनारस में हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना के समय विश्वविद्यालय निर्माण के सहयोग लेने की गरज से राजा से मिलने दरबार में हाजिर हुए थे। यह बात 1914 ,15 के आसपास की है। और यहां के  राजा पृथ्वीपाल सिंह से मिलकर यूनिवर्सिटी निर्माण में सहयोग देने का अनुरोध करने यहां पर बड़ी उम्मीद के साथ आए थे। राजमहल में जब पंडित जी सहयोग राशि मांगने राजा के सामने दरबार में प्रस्तुत हुए तो राजा पृथ्वीपाल सिंह जी ने उनसे सहयोग राशि के बारे में पूछा ,तो उन्होंने जवाब दिया था कि दान मांगने वाला दान की धनराशि नही तय करता है यह सुनकर राजा पृथ्वीपाल सिंह जी ने  धनराशि देने का मंत्री को आदेश दिया कि आज खजाने मे जितनी धनराशि जमा हुई हो उसे मदन मोहन मालवीय जी को दान दे दो।

राज कोष में आई उस दिन की समस्त धनराशि राजा ने उन्हें दान दे दी थी।

और अब तक इसका संचालन चंद्रहास भवन से ही हो रहा है। लेकिन राजा पृथ्वीपाल सिंह निसंतान रहे। वर्ष 1932 मै राजा पृथ्वीपाल सिंह जी की मृत्यु हो गयी। एतिहासिक विरासत पर वंश चलाने के लिये उन्होने अपने जिवन काल मै ही अपनी रियासत के ही गाँव के निवासी कुँवर महेंद्र प्रताप सिंह को गोद लिया था, लिहाजा राजा पृथ्वीपाल सिंह मृत्यु के उपरान्त कुँवर महेंद्र प्रताप सिंह ने राजपाठ सम्भाला।

1944 मै अल्प आयु मै ही कुँवर महेंद्र प्रताप सिंह की मृत्यु हो गयी 

मजबुरी मै रियासत के सलाहकारो ने वरासत के फार्मूला पर कुँवर महेंद्र प्रताप सिंह के चचेरे भाई कुँवर दान बहादुर सिंह को विरासत की बागडोर सोंप दी।

कुँवर दान बहादुर सिंह का विवाह नवम्बर 1945 मे सोहावल फैजाबाद के जमींदार त्रिशूल सिंह की पुत्री शांति देवी से हुआ दिसंबर 1946 मै राजा दान बहादुर सिंह भी काल की गती का शिकार हो गये।

ओर मात्र 18 वर्ष की आयु मै महारानी शांति देवी को वैधव्य का सामना करना पढा, वर्ष 1946 मै महारानी शांति देवी ने 45 किलोमिटर के क्षेत्र मे फेले रियासत की जिम्मेदारी  का निर्वहन शुरु किया।

भारत सरकार की सीलिंग के बाद शेष रियासत की अरबों की सम्पत्ति की देखभाल सम्भाल रही निसंतान शांति देवी गोरव को संजोय रखी थी।

दिसम्बर 2008 मै दो बार इस महल पर हमले हुए थे दोनो वारदातो के मुल्जिम गिरफतार हुए,उनका कहना था की राजमहल मै उन्हे कीमती ईटों की जानकारी मिली थी।

इसके बाद पुलिस ने यहा पुलिस चौकी भी स्थापिक कर दी है।

महारानी शांति देवी अल्पआयु मै ही विधवा होने के बाद बाराबंकी लखनऊ ओर मंसुरी स्थित राजघराने की सम्पत्ति को उन्होने अक्षुण्य रखा था वह ताजा हमले से सश्ंकित थी।

लेकिन उन्होने धेर्य नही छोडा था उन्होने किसी को वारिस भी नही बनाया था उनका कहना था कि मै शांति देवी स्मारक ट्रस्ट गणित किया है इस ट्रस्ट के माध्यम से वह शीघ्र ही यहा अन्तराष्ट्रीय मानको के अनुरुप मेडिकल कालेज व चिकित्सालय कि स्थापना की।जिसमे लम्बे समह तक क्षेत्र के लोगो को बहरेलिया सिसोदिया रियासतो की छांव मिल सके। रानी शांति देवी जी की  2017 मै मृत्यु हो गयी।

अब वर्तमान समय में यहां पर डिग्री कॉलेज ,फार्मेसी कॉलेज, डीएलएड कॉलेज, साथ ही सीएमएस लखनऊ शाखा का सीएमएस स्कूल भी चलाया जा जा रहा है

✏ठाकुर महेश प्रताप सिंह बहरेलिया 

#जय_महाराजा_महिपाल_सिंह_जी🦁

#जय_राजा_पृथ्वीपाल_सिंह_जी🦁

#जय_बहरेलिया_सिसोदिया_राजपूत_राजवंश⚔🦁🦁

#जय_राजपुताना

#जय_माँ_भवानी

Comments

Post a Comment